मेरे अंदर का बच्चा, ही मेरा भगवान् है।
हिन्दू नहीं, मुसलिम नहीं, वो सिर्फ इक इंसान है।
जानता है क्या सही, क्या गलत सब है हो रहा।
उसको ही सरे कर्म की, सबसे अच्छी पहचान है।
मेरे अंदर का बच्चा, ही मेरा भगवान् है।

माना उसमे न समझ सही, ना मोल भाव को जानता।
पर दिल का तो वो साफ़ है, वो फरक नहीं पहचानता।
जिसको ढोंघि समझ, विद्वान ये बुद्धि आगे बढ़ जाती हैं।
उस रंक को दुखी इंसान देखकर, उसमे करुणा भर जाती है।
बिन सोचे वो मदद करे,ऐसा वो नादान हैं।
पर मेरे अंदर का वो, बच्चा मेरा भगवान् है।

हर चीज़ सुहानी उसको, अच्छी यूँ ही लग जाती है।
द्वेष देख ना पाता है, उसकी आत्मा घबराती है।
वो बारिश की बूंदों में, खिलखिला के हंस जाता है।
और देख बाढ़ के दुखद दृश्य, उसका मन घबरा जाता है।
दया भरी उसके मन में, वो मानवता की पहचान है।
वो मेरे अंदर का बच्चा, ही मेरा भगवान् है।

वो जनता नही कौन है अल्लाह, कौन यहाँ पे दूजा है।
उसने तो बस इंसान को देखा, उसकी इतनी सी पूजा है।
वो न चाहे मार काट के, अपने आप को श्रेष्ठ बता जाना।
वो तो बस हंसना चाहे, चाहे सब में वो प्रेम बढ़ाना।
वो सबको इक नज़र से देखे, न जाने कौन महान है।
हाँ मेरे अंदर का बच्चा, ही मेरा भगवान् है।

फिर भी मैं उस बच्चे को, अपने में कहीं दबा दूंगा।
रोज़ लड़ूंगा अपनों से, अपने खुदा को श्रेष्ठ बता दूंगा।
उसकी ज़मीन के लालच में, मैं भाई से छल कर जाऊंगा।
और झूंठी अपनी शान की खातिर, हँसते हंसते मर जाऊंगा।
माफ़ करेगा फिर भी मुझको, इतना वो दयावान है।
वो मेरे अंदर का बच्चा, ही मेरा भगवान् है।

-अभिषेक

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