इन वादियों में बिखरे, वो रंग जो बहार के।
हर रंग सुर्ख लाल है, इस देश पर प्रहार के।
हर कली खिलती है यहाँ, श्रधांजलि के लिए।
ना प्रेम है ना आस्था, उद्देश्य हैं विकार के।

देखो गगन को चूमते, वो पहाड़ बर्फ से बने।
वो घाटियां, वो रास्ते, सब खून से हैं अब सने।
बन्दूक है सबका मज़हब, खुदा है सबका गोलियां।
गीता नहीं ना कुरान है, न कबीर की हैं बोलियाँ।
इक दुसरे को मारते, जो ज़मीन के हैं नाम पर।
मर जायेगा हर शक़्स यूँ, ना जनाज़ा उठे ना डोलियाँ।

ये जो बैठे सरहद पार हैं, ना दोस्त हैं ना हमसफ़र।
भाई को अपने मारते, तुमपे है इनका ये असर।
हैं ज़मीन के बस लालची, इनकी न कोई ज़ात है।
और ताज हमसे छीन ले, इनकी ना ये औकात है।
जो पाक खुदको बोलते, ईमान उनके हैं सने।
भड़काते तुमको लोभ में, ऐसी ही इनकी बिसात है।

हिन्दू नहीं, मुस्लिम नहीं, इंसान तुम हो मारते।
हथियार लेकर यूँ खड़े, हर जीत में हो हारते।
क्या जीत पाया है कभी, कोई हारों को हरा कर यहाँ।
कोई राज कर पाया है क्या, लाशें दफ़न रहती जहाँ।
गर जीतना ही है तुम्हे, जीतो दिलों को प्यार से।
इक नाम बस रह जायेगा, फिर तुम कहाँ, और वो कहाँ।

कुदरत ने तो बनाया बस, ज़मीन का टुकड़ा था वो।
जन्नत कहा, कभी स्वर्ग था, इसका तो बस दुखड़ा था वो।
हम जैसे लाखों आये थे, ना तख़्त हैं ना राजा रहे।
ना कोई अब पंडित रहा, ना मौलवी, ना ख्वाजा रहे।
जो रह गया रंग लाल सा, वोही टुकड़ा बस ज़मीन का।
जो धुल गए, वो चोट थे, पर ज़ख़्म सब ताज़ा रहे।

-अभिषेक

Tags: