वन्दे मातरम् कहने वाले, क्या इसका मतलब जानते?
है शपत इस शब्द में, क्या वो हैं ये पहचानते?

सर्वस्व अपना वार दूँ, फिर भी ना उतरे ये कसम।
मेरी धरा को जो गर्व हो, उस पथ पे हों मेरे कदम।
हिन्दू, मुसलमां, सिख, इसाई, सब तेरे से कम हैं माँ।
आन-बान तोह देश था, अब देश मेरा है धरम।

खुद यदि हूँ खा चुका, तो जानवर सा जी रहा।
एहसास औरों की भूंख का, मुझको हैं जीवित कर चला।
जीवंत कर हर प्राण को, मैं चल दूँ तेरी शान में।
भूंख की अग्नि में आज, देश मेरा है जला।

कृष्ण बन जिस देश ने, नारी की लाज बचाई थी।
रोता हूँ मैं ये सोच के, उसी में निर्भया आई थी।
ले ज्योति अब हूँ सोचता, कहाँ है वो लौ सम्मान की।
जो ले प्रतिज्ञा चरित्र की, यहाँ राम ने जलाई थी।

जिस देश ने नारी को पूजा कर, बना देवी दिया।
उस देश ने देखो, उसी नारी को क्या है कर दिया।
जलती है दुर्गा दहेज़ में, और लक्ष्मी कोख में मार दी।
निशब्द हूँ।
माँ पूछती, 'क्या स्नेह का है कर दिया?'

सीमाओं को हैं लांघते, जिनकी ना कुछ औकाद हैं।
खुद हैं भूंखे मर रहे, हथियार उनके हाथ हैं।
आती शरम ये सोच के, चुप चाप मैं हूँ देखता।
जो गरिमा से हैं खेलते, मेरे देश की औलाद हैं।

जिस शब्द की खातिर, यहाँ मर जाते थे वो शान से।
झाँसी कभी, कभी अमृतसर, बलिदान थे क्या नाम के।
जो लूट के खाता इसे, सत्ता है उसके ही हाथ में।
वो है धनि, चालाक है।
'वंदे' हैं उसके ही नाम के।

कह के वंदे मातरम्, हम उठ चले अब गर्व कर।
आँखों में ऑंखें डाल के, बातों से अपनी तर्क कर।
जो है गलत झुक जायेगा।
वो बोल कुछ ना पायेगा।
सच्चाई के तेरे तेज से वो शर्म में मर जायेगा।

-अभिषेक

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