सूर्य तेरी प्रज्वलित किरणे, देखो यदि नहीं होतीं।
जीने का उत्साह ना होता,
आशाएं नहीं होतीं।

काले अंधियारे बादल, घिरते हैं अभिमानों के।
ढक देते हैं तेज को वो, रास्ते रुके हैं अरमानों के।
काट के अभिमानों के बादल, दिखने दे तू नील गगन।
बाँध के पर अरमानों के तू, उड़ जा जैसे मुक्त पवन।
अंतहीन आशाएं हैं गर तोह,
चारों ओर चलना होगा।
अँधेरी हो राह अगर तोह,
हो प्रचंड जलना होगा।
सूर्य तेरी प्रज्वलित किरणे, देखो यदि नहीं होतीं।
जीने का उत्साह ना होता,
आशाएं नहीं होतीं।

अंधियारों में हो निराश, सब उम्मीदें मर जाती हैं।
परिखेद बढ़ने लगते हैं, इच्छाएं घबराती हैं।
उदासीनता के जीवन में, बन प्रकाश पुंज जलता जा।
इच्छाओं को शक्ति दे तू, उम्मीदों को फिर से जगा।
तेरी रोशन काया से,
जगमग हो जाये ये संसार।
हर्षित हों तुझे देख के सब मन,
सकारात्मक आएं विचार।
सूर्य तेरी प्रज्वलित किरणे, देखो यदि नहीं होतीं।
जीने का उत्साह ना होता,
आशाएं नहीं होतीं।

लालच की इस शीत भूमि पे, भावनायें जम जाती हैं।
करुणा, प्रेम, दान, दया आदि,बातें बन कर रह जाती हैं।
जमे हुए ऐसे मन को फिर अपनी ज्वाला दिखला दे,
कोई प्रपंच ना रहे बाकी, अग्नि ऐसी तू भड़का दे।
ऊष्मा हो तेरी ऐसी के,
सबको फिर से ,प्यार मिले।
करुणा पैदा हो दिल में फिर,
दान, दया, सत्कार मिले।
सूर्य तेरी प्रज्वलित किरणे, देखो यदि नहीं होतीं।
जीने का उत्साह ना होता,
आशाएं नहीं होतीं।

कलयुग की इस दुनिया में मैं, हँसता हूँ पढ़ अपनी कविता।
समझ रहे हैं सूरज को सब, भाव किसी ने ना देखा।
पढ़ने वाले ना समझें, ये उनकी रोज़ कहानी है।
सूर्य हैं वो इस कविता के और, माया सारी बेगानी है।
खुद को जिसने जला दिया,
वो रोशन है, वो तेजस है।
जड़ बुद्धि लोगों में वो ही,
ज्ञानी है, वो चेतस है।
सूर्य तेरी प्रज्वलित किरणे, देखो यदि नहीं होतीं।
जीने का उत्साह ना होता,
आशाएं नहीं होतीं।


-अभिषेक

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