आज फिर बारिश की बूंदों ने,
मेरी चेतना को जगाया है।
मिट्टी की सोंधी खुशबु ने,
ये कह के मुझे उठाया है।
नयी ऊर्जा से जीवन की,
कश्ती को नयी दिशाएं दे।
ले कर सूखे दिन की यादें,
कौन यहाँ जी पाया है।
आज फिर बारिश की बूंदों ने,
मेरी चेतना को जगाया है।

कठिनाई की तपती गर्मी में,
मैंने हिम्मत खोई थी।
बिन आँसूं के घोर निराशा में,
मेरी ऑंखें रोईं थी।
देख विपत्ति के आकार,
हौसले मेरे डगमगाए थे।
अपनी कोशिश पे मैंने फिर,
अंकुश बड़े लगाये थे।
समय के पंजों ने फिर जैसे,
हो मन की मेरे बात पढ़ी।
जान के मेरी गिरती हिम्मत,
कर दी अपनी पकड़ कड़ी।
अपनी क्षमता पे शक करके,
कौन यहां रह पाया है।
विधि ने मुझको भागना ही,
पंथ आखरी दिखाया है।

देख के बढ़ते अत्याचार,
मैंने आशाएं मारी थीं।
सुन के पीड़ित की पुकार,
मेरी उम्मीदें हारी थीं।
सोच रहा था छोड़ के ये सब,
निकल जाऊं मैं दूर कहीं।
इस अपनी जलती धरती से,
औरों की है छाँव भली।
छोड़ दिया सब नाम प्रभु के,
सोचा वो ही देखेगा।
मैं तो निकल जाऊंगा बाहर,
कौन यहाँ सब भोगेगा।
जलता है तो सब जल जाये,
ये तो बस एक माया है।
सोच के ये छोड़ा सब मैंने,
अब अपना देस पराया है।

देख के जगमग रोशन काया,
परदेस लगे मुझे अपना सा।
जो बीत गया वो घूंठ कड़वा था,
ये सुन्दर बस एक सपना सा।
याद ना आवे घर अपना अब,
ये संसार गजब निराला है।
वो अंधियारी बस्ती थी,
ये सुन्दर, सकल उजाला है।
इसमें रम के अपना लूँ इसे,
कोशिश करूँ मैं ये दिन रात।
नयी परिस्थिति, नया है जीवन,
करूँ ना कोई पुरानी बात।
जीवन सुख में बीत जाये,
लोगों ने ये समझाया है।
नहीं सोचूं अब कठिनाई को,
सुख को मैंने अपनाया है।

बीत गयीं वो बातें सारी,
नयी विपत्तियां यहाँ भी हैं।
आकार बढ़ा रहीं हैं वो,
आगें लगी यहाँ भी हैं।
सोच रहा हूँ नव घर ढूंढूं,
ये सब छोड़ के जाऊं मैं।
लेकिन क्यों ना अपने अंदर,
ये ज्वाला भड़काऊं मैं।
बंजारों सा भटक लिया मैं,
बारी आग भुजाने की।
जितनी कठिनाई हो चाहे,
आगे उसके अड़ जाने की।
भाग भाग कठिनाई से मैंने,
कठिनाई को पाया है।
त्याग के घर, जैसा हो चाहे,
कौन यहाँ रह पाया है।

बहुत समय के बाद आज फिर,
अंतर मन में आंच उठी।
यह चिंगारी जीने की है,
जीवन की अब दिशा नयी।
चाहे जीतूँ, चाहे हारूँ,
खुद से यह कह पाऊँगा।
हवा मेरे अनुकूल ना सही,
कोशिश कर दिखलाऊँगा।
जैसे ही साहस भर मैंने,
बाहर कदम बढ़ाया है।
देवों ने वैसे ही उपर,
शंख नाद करवाया है।
सारी सृष्टि ने फिर मेरी,
मदद को हाथ बढ़ाया है।

घिर आये बदल सुख के और,
फिर बारिश की बूंदों ने, मेरी चेतना को जगाया है।

-अभिषेक

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