क्या आज मैं आज़ाद हूँ?
नव विचारों को कुचल के हस रहा है अब कोई।
पुलकित फूल जैसी कल्पना को रोंदता है अब कोई।
उत्तेजनक कह के कोई लड़ता है बातों पे यहाँ।
तन पे खादी ओढ कर, मुझे लूटता है अब कोई।
क्या आज मैं आज़ाद हूँ?

बेटी नहीं पहने जो चाहे,
बेटे कहें मेरे सयाने।
निर्वस्त्र अपनी सोच को,
चाह रहे हैं वो छिपा लें।
चल पाएं ना स्वतन्त्र वो, गलियों में या बाज़ार में।
बैठे हैं  भूखे भेड़िये, उनके इंतज़ार में।
छेड़ें वो मेरी बेटियों को,
अंकुश नहीं उन पर यहाँ।
मौन हो मैं देखती,
बस इस लिए बर्बाद हूँ।
क्या आज मैं आज़ाद हूँ?

कोई कुछ भी जा कहे,
लड़ते हैं अपनों से सभी।
भगवान बन के बैठते,
पूछा है इनसे ये कभी?
जब धर्म सबसे श्रेष्ठ है, तो इतने फिर बनाये क्यूँ?
मंदिर से कुछ,
मस्जिद से कुछ,
आपस में ये लड़ाए क्यूँ?
चीखें मेरी सुन पाओ तोह,
आएगा तुमको ये समझ,
अपने ही मरते बालकों के दर्द की फ़रियाद हूँ।
क्या आज मैं आज़ाद हूँ?

मेरे विभाजन के लिए,
लड़ते हैं आपस में यहाँ।
जो जान मुझ पर वार दें,
वो पुत्र मेरे अब कहाँ।
वो लक्ष्मी थी, वो थे भगत, वो चंद्रशेखर ग़ांधी थे।
तुमको यूँ ही रोंद दें,
वो लाल मेरे आंधी थे।
मार से घायल हुई,
मैं बोझ से टूटी हुई।
संसार के चेहरे पे,
बस एक बदनुमा सा दाग हूँ।
क्या आज मैं आज़ाद हूँ?

-अभिषेक

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