किलकारी  सी  बन  के  आई  थी,  जीवन  में  तेरे  मैं  कभी।
क्यों  तेरी  बातों  की  तपिश  से  मूक  बन  के  रह  गयी।।
आँखों  में  झिलमिल  रौशनी  सी  देखता  था  तू  कभी,
बन  तेरी  गुड़िया  आज  ऑंखें  बंद  कर  के  रह  गयी।

पूजित  थी  मैं,  शापित  बनी।
दुर्गा  थी  मैं,  दूषित  कहि।
जो  नज़रें  मुझको  देख  कर  हंसती  थीं  मन  ही  मन  कभी,
उन  नज़रों  की  नज़रों  में  बस  एक  पाप  बन  के  रह  गयी।
जो  गर्व  करता  था  मुझे  कह  बेटी  अपने  बाप  की,
ये  दुनिया  मुझको  बोझ  काँधे  का  उसी  के  कह  गयी।
आँखों  में  झिलमिल  रौशनी  सी  देखता  था  तू  कभी,
बन  तेरी  गुड़िया  आज  ऑंखें  बंद  कर  के  रह  गयी।

रानी  थी  मैं,  दासी  रही।
तेरे  स्नेह  की,  प्यासी  रही।
जो  हाथ  संग  संग  थाम  कर  सोचा  था  चल  दूंगी  कहीं,
उस  हाथ  के  वारों  से  चोटिल  लाश  बन  कर  रह  गयी।
ले  वस्त्र  मुझको  ढांकता  था,  ठण्ड  से  बच  जाऊं  मैं,
मेरी  ही  चुनरी  हाथ  लेना,  उसकी  इच्छा  बन  गयी।
आँखों  में  झिलमिल  रौशनी  सी  देखता  था  तू  कभी,
बन  तेरी  गुड़िया  आज  ऑंखें  बंद  कर  के  रह  गयी।

माँ  कभी,  बेटी  बनी।
कभी  बन  सखी,  तेरे  संग  चली।
जो  सोच  नादानी  मेरी,  मुझे  माफ़  करता  था  कभी,
उस  दोस्त  की  सोचों  में  दूषित  चीज़  बन  के  रह  गयी।
आँचल  में  मेरे  खेल  कर  जन्नत  को  पाया  था  कभी,
हो  कर  बड़े,  आँचल  वही,  एक  चीज़  छोटी  रह  गयी।
आँखों  में  झिलमिल  रौशनी  सी  देखता  था  तू  कभी,
बन  तेरी  गुड़िया  आज  ऑंखें  बंद  कर  के  रह  गयी।

-अभिषेक

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