बाँटो  मुझे  ईमान  पे,  मेरे  हज़ारो  नाम  पे|
बाँटो  मुझे  तुम  धर्म  पे, मुझे  बाँट  दो  तुम  कर्म  पे|
बाँटो  के  फिर  उठ  ना  सकूँ|
काटो  के  फिर  जुट  ना  सकूँ|
जो  उठ  गया  हो  एक  जुट,
तुम  भागते  रह  जाओगे|
कोई  पंथ  फिर  मिलेगा  ना,
तुम  हांफते  मर  जाओगे|

बांटो  मुझे  मेरे  देश  पे,  और  उसके  हर  प्रदेश  पे।
बांटो  मुझे  दिशाओं  पे,  जीने  की  सब  आशाओं  पे।
बांटो  के  अपनी  नाव  को,  मैं  छोड़  दूँ  मझदार  में।
मारूं  मैं  अपने  भाई  को,  और  खून  हो  पतवार  में।
पर  उठ  खड़ा  हो  गया  गर,  ले  भाई  संग  पतवार  को।
कश्ती  किनारा  एक  होगा,  देखते  रह  जाओगे।
कोई  पंथ  फिर  मिलेगा  ना,
तुम  हांफते  मर  जाओगे।

बांटो  मुझे  मेरे  पंथ  पे,  उसपे  लिखे  हर  ग्रन्थ  पे।
बांटो  मेरी  औकाद  पे,  मेरी  हर  इक  फरियाद  पे।
बांटो  के  खुद  ही  चल  पडूँ,  मैं  अपने  घर  को  फूंकने।
न  गिरजा  रहे,  न  मस्जिद  बचे,  चलूँ  अपने  राम  पे  ही  थूखने।
पर  बन  कभी  मैं  राम  जो  चल  दूँ  धनुष  को  थाम  के,
न  मंदिर  मैं  तुम,  न  मस्जिद  में  ही  तुम  कोई  जगह  पाओगे।
कोई  पंथ  फिर  मिलेगा  ना,
तुम  हांफते  मर  जाओगे।

मुझे  बाँट  दो  मेरि  भाषा  पे,  मेरे  हज़ारो  क़र्ज़  पे|
जिनकी  वजह  से  मैं  मूक  हूँ,  उन  परिवारिक  फ़र्ज़  पे|
पर  मारने  से  पहले  तुम,  मेरी  गुज़ारिश  मान  लो|
मैं  कौन  हूँ?
कहाँ  से  हूँ?
पहचान  मेरी  जान  लो|

"मैं  श्लोक  हूँ,  मैं  अज़ान  हूँ,  मैं  तेरी  भी  पहचान  हूँ|
हर  चोट  पे  दुखता  है  जो,  मैं  आम  वो  इंसान  हूँ|"

मुझ  को  ख़त्म  कर  तन्हाईओं  में  दफ़्न  कर  दो  तुम  अभी|
जो  रह  गया  ज़िंदा  अगर,
तेरे  अंत  का  फरमान  हूँ||
मैं  आम  एक  इंसान  हूँ,  मैं  आम  एक  इंसान  हूँ|

-अभिषेक

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